CTET Paper II (Upper Primary: Class 6-8)

हिंदी शब्द भंडार - तत्सम तद्भव देशज विदेशज शब्द question bank (Language II (Hindi))

Practice 72 free CTET Paper II (Upper Primary: Class 6-8) Language II (Hindi) - हिंदी शब्द भंडार - तत्सम तद्भव देशज विदेशज शब्द questions with answers and step-by-step solutions.

Q1.
मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमज़ोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाँढ़स बँधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

'अनहद' शब्द में -

CTET Paper II - Dec 2018, Q102 (Official PYQ)

(A)
'अ' उपसर्ग है
(B)
'द' प्रत्यय है
(C)
'अन' उपसर्ग है
(D)
'हद' प्रत्यय है
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Q2.
माइकलएंजेलो इटली के बहुत प्रसिद्ध शिल्पकार थे। वे बड़ी सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे। लोगों ने पूछा कि आप इतनी सुंदर मूर्ति कैसे गढ़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं मूर्ति कहाँ गढ़ता हूँ। वह मूर्ति तो पहले से ही पत्थर में थी, मैंने तो सिर्फ़ पत्थर का फालतू हिस्सा हटा दिया तो मूर्ति प्रकट हो गयी! तो विद्यार्थी को अपना परिचय पाने में, स्व-भान होने में मदद करना ही शिक्षक का काम है। अब यह स्व-भान कैसे हो? कहते हैं, सेल्फ़ इज़ लाइक अ रे - जो साइंस में माना जाता है कि प्रकाश की किरण अदृश्य होती है, वह आपको दिखाई देती है, वैसे हमारा जो 'स्व' है वह शून्य में, अभाव में समझ में नहीं आता। वह तब प्रकट होता है, जब मैं स्व-धर्म कर्तव्य-कर्म करता हूँ। कर्म करते-करते मुश्किल का जब मैं सामना करता हूँ तब मेरा रूप, मेरी शक्ति, मेरे स्व का मुझे पता चलता है। स्व-धर्म रूप कर्म करते हुए जो स्व मेरे सामने व्यक्त होता है, वही मेरी शिक्षा है। इसलिए शिक्षा दी नहीं जा सकती, बल्कि अंदर से अंकुरित होती है और उस प्रक्रिया में शिक्षक केवल बाहर से मदद करता है। जैसे पौधे के अंकुरित होने में, इसके प्रफुल्लित होने में सीधा हम कुछ नहीं कर सकते। परंतु बाहर से खाद-पानी देना, निराई करना, प्रकाश की व्यवस्था आदि कर सकते हैं।

'अंकुरित' शब्द में प्रत्यय है-

CTET Paper II - Dec 2018, Q135 (Official PYQ)

(A)
इत
(B)
रित
(C)
त
(D)
अं
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